tag:blogger.com,1999:blog-141721222007-10-26T22:13:52.605-07:00भाषा राजनीतिगिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comBlogger14125tag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1161838928469484372006-10-25T21:58:00.000-07:002006-10-25T22:02:08.480-07:00केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से हिन्दी हटी<i>स्वतंत्र वार्ता</i> के <a href="http://swatantravaarttha.com/pages/arch/25/HINDI-1.pdf">इस ख़बर</a> के अनुसार, इस ख्याति संस्थान में इस वर्ष से पाठ्यक्रम से हिन्दी हटा दिया गया है। कारण यह बताया गया है: "हिन्दी भाषी प्रवासी भारतीयों की संतानें हिन्दी की बजाय अंग्रेज़ी पढ़ना ज़्यादा पसंद करती हैं।" पर इस "१०० साल से भी अधिक" पुराने विभाग का "हिन्दी भाषी प्रवासी भारतीयों की संतानों" से कम ही वास्ता है। विलायत में हिन्दी और संस्कृत की पढ़ाई की जड़ों का संबंध एक तरफ़ ब्रिटेन और भारत के उपनिवेशीय इतिहास से है और दूसरी ओर १७-वीं और १८-वीं शताब्दियों की यूरोपीय ग्यानोदय से है। (भारत और केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के संबंधों का एक इतिहास आप विश्वविद्यालय की ही दी हुई <a href="http://media-newswire.com/release_1038674.html">इस प्रकाशन</a> में पढ़ सकते हैं।)<br /><br />एक और बात: केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के हिन्दी के पूर्व प्राध्यापक डा. सत्येंद्र श्रीवास्तव विश्वविद्यालय को "स्व्यंपोषित संस्था" बतलाते हैं। यह सच नहीं है। विश्वविद्यालय की ही सूत्रों के अनुसार २००५-६ के दौरान इंग्लैण्ड की उच्च शिक्षा परिषद् केम्ब्रिज विश्वविद्यालय को शोध कार्य के लिए ७८५ <i>करोड़</i> रुपये देने वाली थी! (Phillipson, Robert. 2005. "English, a cuckoo in the European higher education nest of languages?" प्रकाशित होने वाला है: <i>European Journal of English Studies</i> में।)गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1161354130713548632006-10-20T06:51:00.000-07:002006-10-20T07:22:14.236-07:00८२३ ज़बानों में प्राथमिक शिक्षा पापुआ न्यू गिनी में!<a href="http://portal.unesco.org/unesco/ev.php?URL_ID=34830&URL_DO=DO_TOPIC&URL_SECTION=201&reload=1161003505">युनेस्को के इस रिपोर्ट</a> के अनुसार, पापुआ न्यू गिनी में प्राथमिक शिक्षा के पहले कुछ साल उस देश की सभी ८२३ ज़बानों में दी जाती है! यह हुआ ना, बहुभाष्यता को क़ायम रखने का सच्चा प्रयास!गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1160020657018770152006-10-04T20:30:00.000-07:002006-10-04T21:01:47.073-07:00वापसीअफ़लातून से ईमेल आया। ध्यान खींचा अंतरजाल में एक बहस की ओर -- गाँधी जी के भाषा-संबंधी विचारों पर। यहाँ पर -- <a href="http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?id=605">http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?id=605</a><br /><br />तो लगता है फिर ये चिट्ठों का सिलसिला शुरु करना होगा।गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1145728994654066622006-04-22T11:00:00.000-07:002006-04-22T11:07:35.190-07:00प्रशंसनीय पाठ्यपुस्तक -- पर केवल अंग्रेज़ी में?NCERT की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा और भाषा-शिक्षा के वेषय में उसकी क़ाबिल-ए-तारीफ़ अनुशंसाओं के बारे में <a href="http://bhasha-rajniti.blogspot.com/2005/07/ncert.html">पहले भी लिख चुका हूँ</a>। उसी रूपरेखा के अनुसार पाठ्यपुस्तकें रची गयी हैं जो अगले शैक्षिक वर्ष से इस्तेमाल की जाएँगी। इतिहास पाठ्यपुस्तकों की प्रशंसा जाने-माने इतिहासकार सुमित सरकार ने <a href="http://www.hindu.com/2006/04/17/stories/2006041702711000.htm">अंग्रेज़ी अख़बार The Hindu में अभी की है</a>।<br /><br />प्रोफ़ेसर सरकार का ऐलान है कि ये रंगीन पुस्तकें "इतिहास को एक सृजनात्मक ढंग से पढ़ाती हैं"। पूरे इतिहास से परिचित कराने का प्रयास छोड़ना; सिर्फ़ कुछ ख़ास हादसों पर ग़ौर करना; क्लास में वाद-विवाद को प्रमुख बनाना; कपड़ों और क्रिकेट के इतिहास जैसे "मामूली" विषयों पर भी विचार-विमर्श करना -- यह हैं कुछ ख़ासियतें इस पाठ्यपुस्तक की। <br /><br />इन पाठ्यपुस्तकों को आप <a href="http://www.ncert.nic.in/textbooks/testing/Index.htm">NCERT के वेबसाइट से डाउनलोड कर सकते हैं</a>।<br /><br />आशा रखते हैं कि ऐसी ख़ूब पाठ्यपुस्तकें भारत की अन्य भाषाओं में भी जल्दी ही उप्लब्ध होंगी। उच्च कोटी के शिक्षा साधनों की भारतीय भाषाओं में सख़्त ज़रूरत है।गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1142917644545584442006-03-20T20:37:00.000-08:002006-03-21T04:57:35.796-08:00भारत में स्कूलों में जापानी पढ़ाई जाएगी<a href="http://www.newkerala.com/news2.php?action=fullnews&id=18327">पत्रिकाओं में रिपोर्टों के अनुसार</a>, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का कहना है कि अगले शैक्षिक वर्ष से ९० से ज़्यादा स्कूलों में जापानी भाषा पढ़ाई जाएगी।<br /><br />यानी ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी पाने के कुछ ६० साल बाद हम एक नज़र हमारे पड़ोस की ज़बानों पर डाल रहे हैं -- कहाँ हैं हमारे पाठ्यक्रम फ़ार्सी, नेपाली, चीनी, म्यानमारी, सिन्हला में?<br /><br />पर क्या जापानी वाकई पढ़ाई जाएगी? एक तरफ़ है सरकार जो कहती है (<a href="http://www.cbse.nic.in/japanese.pdf">इस अंग्रेज़ी लेख में</a>) कि जापानी भाषा का ग्यान आजकल के अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक महौल में ज़रूरी है, पर साफ़-साफ़ यह भी कहती है कि स्कूलों को जापानी पढ़ाने वाले ख़ुद ढूंढने होंगे -- बोर्ड ज़्यादा-से-ज़्यादा उनको कुछ "ट्रेनिंग" दे पाएगी। पर हाँ अगर स्कूलों को बोर्ड की मान्यता चाहिए तो वे इस पाठ्यक्रम का प्रयोग करें, जिसमें ज़ोर दिया गया है "जापानी लिखने पर नहीं बलकि बोलने पर"।<br /><br />नतीजे का अनुमान आप अभी लगा सकते हैं: कुछ चुनिंदा स्कूल और पैसा कमायेंगे यह कहते हुए कि हम ना केवल "कम्पयूटर" और फ़्रेंच पढ़ाते हैं, पर अब जापानी भी, और वो भी सरकारी पाठ्यक्रम के अनुसार। और इन स्कूलों में भारतीय भाषाओं पर ध्यान देनी की ज़रूरत और भी कम महसूस होगी। <br /><br />कुल मिलाकर होगा यह कि बच्चे जो अब बड़ी कुशलता से फ़्रेंच में "Je m'appelle राम लखन" कहते हैं, अब जापानी में 私の名前は राम लखन である कहेंगे -- कम-से-कम गूगल की अनुवादिका के अनुसार!<br /><br />बोर्ड का अंग्रेज़ी लेख पढ़िए <a href="http://www.cbse.nic.in/japanese.pdf">यहाँ पर</a>।गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1140341571686175072006-02-19T01:30:00.000-08:002006-02-20T08:34:54.786-08:00आयुक्त भाषाई अल्पसंख्यक का ४१-वाँ रिपोर्टअल्पसंख्यक भाषाओं की ओर, ख़ासकर उर्दू की ओर, अधिक सरकारी ध्यान की माँग करते हुए एक लेख पढ़ रहा था (<a href="http://www.milligazette.com/dailyupdate/2006/20060210-india-minorities.htm">यहाँ पर</a>) कि अचानक (जैसा अकसर इंटरनेट में होता है) किसी और साईट पर जा पहुँचा। और यहाँ पढ़ने को मिला यह लंबा और उपयोगी प्रतिवेदन आयुक्त भाषाई अल्पसंख्यक का। आयोग का यह ४१-वाँ रिपोर्ट (१९५७ में यह आयोग स्थापित किया गया था) आप हिन्दी में <a href="http://nclm.nic.in/shared/linkimages/24.htm">यहाँ पढ़ सकते हैं</a> (और अंग्रेज़ी में <a href="http://nclm.nic.in/shared/linkimages/23.htm">यहाँ</a>)<br /><br />इस रिपोर्ट की शुरुवात में आयुक्त ने अल्पसंख्यक भाषाओं की सुरक्षता के सिलसिले में कई और देशों और समुदायों के अनुभवों और प्रबंधों का वर्णन किया है। न्यूज़ीलैंड, वेल्ज़, हंगेरी, रूस... ज़ाहिर है कि आयुक्त ने इस सिलसिले में काफ़ी कुछ जाँच-परख की है।<br /><br />प्रतिवेदन का ख़ास भाग भारत के विभिन्न राज्यों की भाषा राजनीति पर ग़ौर करता है। और बार-बार हमें देखने को मिलता है, कि भाषाई बहुसंख्यक अल्पसंख्यक भाषाओं के सुरक्षण की क़दर नहीं कर रहा है। मिसाल के तौर पे, संविधान के अनुसार बच्चों को मातृ भाषा के माध्यम में शिक्षा का हक है। ऐसे ही, देश के हर नागरिक का हक है, कि वो सरकार को आवेदन पत्र या अभ्यावेदन अपनी ज़बान में लिख सकता है, और सरकार का फ़र्ज़ बनता है कि वो ना केवल इन्हें क़बूल करे पर इन लेखों का जवाब भी उस नागरिक की ज़बान में ही दे। इसके अलावा, सरकारी नौकरियों के सिलसिले में भाषा के आधार पर भेद-भाव ग़ैर-कानूनी है। पर आयुक्त का कहना है, कि सरकारें काफ़ी बड़े पायमाने पे इन नियमों का उल्लंघन कर रही हैं।<br /><br />रिपोर्ट के मुख्य अनुशंसाओं में एक यह है, कि संविधान की आठवीं अनुसूचि को विलुप्त कर दिया जाए। आयुक्त का कहना है कि इन २२ ज़बानों की सूची के कारण देश की सभी भाषाओं को समान मानना कठिन हो गया है। (उनके अनुसार, इस अनुसूची के विलुप्त कर देने का एक अर्थ यह होगा कि, "जनगणना आयुक्त द्वारा १०,००० से कम व्यक्तियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं को प्रतिवेदन न करने की प्रथा को समाप्त कर दिया जाए।" अर्थार्त, देश की बड़ी, छोटी और बहुत छोटी -- सभी भाषाओं -- का गणन हो।) यह ४१-वाँ प्रतिवेदन यह भी अनुशंसित करता है, कि वित्त आयोग राज्यों को विशेष अनुदान प्रदान करे जिससे कि वे भाषाई अल्पसंख्यकों का मातृ भाषा में अध्यापन करा पाएँ। <br /><br />इस रिपोर्ट की एक ख़ासियत यह है, कि आयुक्त श्री कृष्ण केवल सेठी की अपनी "आवाज़" अकसर सुनने को मिलती है। कुछ झलकियाँ:<br /><br />"१.२४. सौभाग्यवश भारत में हम ने सदैव ही बहु आयामी संस्कृति के सिद्धाँत को अपनाया है। हमारे यहाँ किसी भाषा या संस्कृति को दबाने की प्रथा नहीं रही सिवाये कुछ ऐसे समूहों को छोड़ कर जिन्हों ने पाश्चात्य राष्ट्र आधारित राज्यों के विचार को अपना लिया है जिसमें धारणा है कि किसी अन्य समूह का ऊपर उठना केवल उनको नीचा दिखाने की कीमत पर ही हो सकता है। परन्तु वह भूल जाते हैं कि अर्थशास्त्र की तरह भाषा विग्यान में भी किसी एक समूह का कल्याण पूरे समाज के कल्याण में वृद्धि करता है।"<br /><br />"१.४६.... यह एक बेकार तर्क है कि रोमन लिपि के ग्यान से संथाली या अन्य की अंग्रेज़ी, जो कि वास्तविक लक्ष्य भाषा है, को अच्छी बना देगा। एक तो अंग्रेज़ी के ग्यान को शिक्षा का लक्ष्य मान लेना ही गलत है। दूसरा लिपि एक होने से भाषा नहीं आती है। बंगाली तथा मणिपुरी में एक ही लिपि है परन्तु रोज़मर्रा के शब्द जो दोनो भाषाओं में एक हैं, उंगलियों पर गिने जा सकते हैं।"<br /><br />"४.६... जैसे अंग्रेज़ी भारतीय भाषाओं को बेदखल नहीं कर सकती वैसे ही प्रधान भषायें अल्पसंख्यक भाषाओं को हटा नहीं सकतीं। और हटाना भी नहीं चाहिये। मातृ भाषा मातृ भाषा है और उसका कोई विकल्प नहीं।"<br /><br />यह एक क़ाबिल-ए-तारीफ़ और पढ़ने योग्य प्रतिवेदन है।गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1138856942806863572006-02-01T20:38:00.000-08:002006-02-02T10:33:22.926-08:00भारत में भाषा कुशलता ग़ायब होती जा रही हैअंग्रेज़ी पत्रिका Frontline में अर्थ्शास्त्री और स्तंभ-लेखिका प्रोफ़ेसर जयती घोष का यह प्रस्ताव है: <a href="http://www.flonnet.com/fl2302/stories/20060210005211100.htm">भारत में भाषा कुशलता ग़ायब होती जा रही है</a>। उनके अनुसार यह प्रक्रिया हमें केवल अंग्रेज़ी में ही नहीं बलकि भारत की अन्य भाषाओं में भी देखने को मिल रही है। हिन्दी, तमिल, मराठी -- इन सब भाषाओं में शिक्षकों की शिकायत है कि बुनियादी हुनर भी अब मिलना मुशकिल हो गया है, ख़ासकर लेख के क्षेत्र में। घोष कहती हैं, “इस तरह आज हमारी शिक्षा व्यवस्था से ऐसे लोग बाहर निकल रहे हैं, जिन्हें किसी भी भाषा में नैपुण्य नहीं है।"<br /><br />घोष का कहना है कि पिछली दो पीढ़ियों की तुलना में आज के नौजवानों में भाषा कुशलता कम होने के पाँच ख़ास कारण हैं -- (क) व्याकरण और वर्तनी पर कम ज़ोर; (ख) विद्यार्थियों की शब्दावली बढ़ाने की उपेक्षा; (ग) साहित्य पढ़ने में कम अभिरुची; (घ) नयी कंप्यूटरी तकनीकियों के कारण जो ना ही केवल वर्तनी ठीक कर देती हैं, पर ठीक शब्द भी प्रदान करती हैं; (च) भाषा और वर्तनी को अपांग करने वाली ईमेल और सेलफ़ोन की SMS (लघु-संदेश सेवा)।<br /><br />यह थीं कारणे लिखने के सिलसिले में। जहाँ तक बोलने का सवाल है, वे कहती हैं कि कसूर है मनोरंजन उद्योग का, ख़ासकर टेलिविज़न पर अमेरिका की धारावाहिकों का राज और फिर उनके भारतीय अवतार जो "हिंग्लिश", यानी हिन्दी और अंग्रेज़ी का एक अजीब मेल इस्तेमाल करती हैं।<br /><br />घोष कह्ती हैं, यह भाषा कुशलता का घटना इस विश्वव्यापी दुनिया में हमारे आर्थिक सेहत के लिए हानिकारक होगा। भविष्य में हमें भाषा निपुणता की ज़्यादा ज़रूरत होगी, कम नहीं। इसके अलावा उनका कहना है कि अगर भाषा और विचार का इतना गहरा संबन्ध है ("जैसा चोम्स्की और पिंकर मानते हैं"), तो क्या यह कहना सच न होगा कि भाषा अभिव्यक्ति की निर्बलता के साथ-साथ विचार शक्ति भी दुर्बल होती जाएगी?<br /><br />भारत में क्या भाषा कुशलता दरअसल घट रहा है, और इसके क्या कारण हो सकते हैं, यह अपने-आप में मुशकिल सवाल है। पर इतना ज़रूर है, कि अगर यह सच है, तो हमें चिन्ता इस लिए कम करनी चाहिए कि इसका असर हमारे कॉल-सेन्टरों और अन्य सेवाओं पर पड़ेगा। यह कुशलता का कम होना इससे कहीं ज़्यादा चिन्ताजनक इसलिए है क्योंकि आज के भारत में हमें जिन समस्याओं से निबटना है, उनके बारे में जानकारी पाने के लिए और उन समस्याओं का समाधान पाने के लिए अनेक बहसों को समझना आवश्यक है। और इस समझ केलिए व्यापक स्तर पर भाषा निपुणता ज़रूरी है।<br /><br />मिसाल के तौर पे, बीजों में आनुवंशिक तब्दीलियाँ (जेनेटिक इंजिनियरिंग) का सवाल, या फिर पानी का सप्लाई या परिवहन का ग़ैर सरकारी हाथों में होने का प्रश्न -- अगर लोकतंत्र में इन मसलों पर ग़ौर करने की कुशलता ग़ायब हो रही है, तो इन समस्याओं का समाधान ढूंढने का हक और ताक़तें छीन लेंगी।<br /><br />प्रोफ़ेसर घोष का लेख पढ़िए (अंग्रेज़ी में) <a href="http://www.flonnet.com/fl2302/stories/20060210005211100.htm">यहाँ पर</a>।गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1136729729506599042006-01-08T06:09:00.000-08:002006-01-09T09:33:18.196-08:00द्विभाषी पुस्तकें बच्चों केलिएअंग्रेज़ी पत्रिका <a href="http://www.hindu.com/yw/2006/01/06/stories/2006010601060600.htm">The Hindu</a> में हाल ही में बच्चों के लिए द्विभाषी पुस्तकों के प्रकाशन पर एक रिपोर्ट पढ़ा। चेन्नाई के <a href="http://www.tulikabooks.com/bilingualbooks.htm">"तुलिका" नाम के प्रकाशक</a> कुछ सालों से तमिल-अंग्रेज़ी, तेलुगु-अंग्रेज़ी, मलयालम-अंग्रेज़ी, कन्नड़-अंग्रेज़ी, गुजराती-अंग्रेज़ी, हिन्दी-अंग्रेज़ी, इत्यादि भाषा-जोड़ियों में बच्चों के लिए द्विभाषी पुस्तकें छापते आ रहे है। अब हैद्राबाद में "स्पार्क" नाम के प्रकाशक के साझेदारी में कई और तेलुगु-अंग्रेज़ी शीर्शकों को प्रकाशित करने का इरादा है।<br /><br />रिपोर्ट की लेखिका, आर. उमा महेश्वरी कहती हैं: "इस तरह के लेखों से, आगे जाकर, बच्चों को शायद हर भाषा की सुन्दरता का एहसास होगा... शायद अनुवाद प्रक्रिया का भी बोध होगा...। पर पहली और सबसे अहम बात यह है, कि ये किताबें बच्चों को यह बात समझा पाएँगी कि वो एक बहु- (या द्वि-) भाषी समाज में रहते हैं।"<br /><br />रिपोर्ट के अंत में एक भाषा-वैग्यानिक कहती हैं: "अंग्रेज़ी सीखने का दाम हमारी अपनी भाषाओं को नही चुकाना चाहिए.... ऐसी पुस्तकों का मकसद हमे यह याद दिलाना है कि हमारे सामाजिक दायरे में दो भाषाओं को साथ-साथ रहना है -- प्रांतीय भाषा और अंग्रेज़ी।"<br /><br />आशा है कि आगे-आगे इस तरह की और कोशिशें देखने को मिलेंगी।गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1126547955160483722005-09-12T10:57:00.000-07:002005-09-30T11:43:34.376-07:00भारत और इंडोनीशिया में अंग्रेज़ीभारत से इंडोनीशिया क्या सीख सकता है? यह सवाल पूछते हैं म्यूनिक के अज़ीज़, <a href="http://www.thejakartapost.com/detaileditorial.asp?fileid=20050912.E02&irec=1">जकर्ता पोस्ट</a> में। उनका उत्तर है कि हम भारतीय एशिया के बाकी लोगों की तुलना में बातूनी हैं, और हमारे बातूनी होने में अंग्रेज़ी का हाथ ज़रूर है, जो हमे आत्मविश्वास देता है। कहाँ भारत और कहाँ इंडोनीशिया, वे कहते हैं, जिसने स्वतंत्रता के तुरंत बाद "बिना सोचे समझे" ना सिर्फ़ नेदरलैण्ड की डच भाषा को निकाल डाला, पर उसकी जगह ना अंग्रेज़ी को देश म ेंआने दिया, ना ही कम-से-कम अरबी को। दुनिया में कामयाब होने के लिए दुभाषी या बहुभाषी होना आवश्यक हो गया है, उनके अनुसार। और पढ़िए (अंग्रेज़ी में) <a href="http://www.thejakartapost.com/detaileditorial.asp?fileid=20050912.E02&amp;irec=1">यहाँ</a>।गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1122154480032235472005-07-23T14:29:00.000-07:002005-07-23T14:34:40.036-07:00कोंकण के लिए "रोमन लिपि ही उचित है"<span style="font-size:130%;">कोंकण के लिए कौन सी लिपि उचित है? इस बहस की भाषा-राजनैतिक पृष्टभूमि के बारे में कभी और बात करूंगा पर यहाँ मैं आपका ध्यान <a href="http://www.daijiworld.com/news/news_disp.asp?n_id=12866&n_tit=Goa%3A+TSKK+Roman+Orthography+best+suited+for+Konkani-Pratap+Naik">इस अंग्रेज़ी लेख</a> की ओर खींचना चाहता हूँ। कोंकण के लिए यह लेखक रोमन लिपि उचित मानते हैं। इनका कहना है कि कोंकण के लिए देवनागरी का इस्तेमाल करना "अवैग्यानिक, तर्क-विरुद्ध और कभी-कभी मूर्खता है, उनके लिए भी जिनकी मातृ-भाषा कोंकण है, और अन्य भाषाओं और कोंकण सीखने वालों के लिए भी।" देवनागरी-कोंकण में ३३ खास कमियाँ हैं, इनके अनुसार, जिन में से ३० दूर कर देती हैं एक परिवर्तित रोमन लिपि जिसे टॉमस स्टीफ़ेन्स कोंकणी केंद्र वालों ने तैयार किया है। इस लिपि के प्रचार के लिए जो काम किए जा रहे हैं उनके वर्णन के साथ यह लेख खतम होता है। अंग्रेज़ी में और <a href="http://www.daijiworld.com/news/news_disp.asp?n_id=12866&amp;n_tit=Goa%3A+TSKK+Roman+Orthography+best+suited+for+Konkani-Pratap+Naik">इधर</a>।</span>गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1121757846939673882005-07-19T00:22:00.000-07:002005-07-19T00:29:02.886-07:00NCERT की भाषा अनुशंसाएँ<span style="font-size:130%;">भाषा से जुड़ी ये निम्नलिखित अनुशंसाएँ NCERT द्वारा <a href="http://www.ncert.nic.in/sites/publication/schoolcurriculum/NCFR%202005/contents1.htm">राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (National Curriculum Framework 2005 (Draft)</a> के हेतु तैयार की गयी थीं। यह रहे कुछ मूल, उस दस्तावेज़ के तीसरे अध्याय से:</span><br /><span style="font-size:130%;">- आज हम अच्छी तरह जानते हैं कि दुभाष्यता और बहुभाष्यता ग्यान हासिल करने में तरह-तरह के फ़ायदे प्रदान करतीं हैं। कई शोध-पत्रों में साबित किया गया है, कि दुभाष्यता से ग्यान हासिल करने की शक्ति में, समाजिक सहनशीलता में, विविध दृष्टिकोणों से सोचने की क्षमता में, और पढ़ाई में कामयाबी हासिल करने में बढ़ौत्री होती है। सामाजिक या राष्ट्रिय स्तर की बहुभाष्यता को हमें एक साधन मानना चाहिए, अन्य राष्ट्रीय साधनों की तरह ही। भारत की बहुभाष्यता की चुनौतियों से निबटने और उसका फ़ायदा उठाने का एक मार्ग है, त्रिभाष्यता।</span><br /><span style="font-size:130%;">- बच्चों की सिक्षा उनकी मातृ भाषा में ही होनी चाहिए।</span><br /><span style="font-size:130%;">- अगर प्रांतीय भाषा उसकी मातृ भाषा नहीं है, तो सिक्षा के पहले दो साल फिर भी उसकी मातृ भाषा में ही होनी चाहिए।</span><br /><span style="font-size:130%;">- प्राथमिक स्तर पर बच्चों के लिए प्रांतीय या राज्य भाषा एक अनिवार्य विषय होगा।</span><br /><span style="font-size:130%;">- मध्य स्तर पर बच्चे राज्य भाषा(ओं) के अलावा अंग्रेज़ी भी सीखेंगे।</span><br /><span style="font-size:130%;">- हिन्दी न बोलने वाले राज्यों में बच्चे हिन्दी सीखेंगे। हिन्दी प्रांतों में बच्चे उनके इलाके में न बोले जाने वाली एक भाषा सीखेंगे। इन भाषाओं के अलावा संस्कृत भी सीखी जा सकती है।</span><br /><span style="font-size:130%;">- उच्च कक्षाओं में एक शास्त्रीय भाषा और विदेशी भाषा भी शुरू की जा सकती है।</span><br /><span style="font-size:130%;">- भाषा सिक्षा को बहुभाष्य होना चाहिए। सिर्फ़ भाषाओं की संख्या में ही नहीं, पर इसमें भी कि इस बहुभाष्यता का फ़ायदा हर संदर्भ में कैसे उठाया जाए। अर्थार्त हमें बहुभाष्य कक्षा को एक साधन बनाने के तौर-तरीके सोचने होंगे।</span><br /><span style="font-size:130%;">पूरा दस्तावेज़ (अंग्रेज़ी में) <a href="http://www.ncert.nic.in/sites/publication/schoolcurriculum/NCFR%202005/contents1.htm">यहाँ पर</a>।</span>गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1120642751247887922005-07-06T02:37:00.000-07:002005-07-06T03:27:37.003-07:00उर्दू का केंद्रबिंदु दक्षिण भारत में<span style="font-size:130%;">"उर्दू का केंद्रबिंदु अब दक्षिण भारत में है।" फ़िल्मकर्ता महमूद फ़ारूक़ी का यह कथन हालही में हुए १०वीं और १२वीं परीक्षाओं के परिणामों पर आधारित है। भारत में तक़रीबन सभी उर्दू सीखने वाले मुसलमान हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में -- जहाँ भारत के अधिकतर मुसलमान, और इसलिए अधिकतर उर्दू सीखने वाले, रहते हैं -- केवल २५-३०% विद्यार्थी ही उन परीक्षाओं में सफ़ल हो पाए हैं। पर महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों में प्रतिशतता ७० या ८० प्रतिशत भी पायी गयी है। फ़ारूक़ी का मानना है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में हिन्दी का प्रभाव बहुत अधिक है, और उर्दू बोलने वाले छात्र इन राज्यों में आसानी से उर्दू को छोड़ कर अपना अस्तित्व हिन्दी से जोड़ लेते हैं। फ़ारूक़ी का यह भी कहना है कि उर्दू का इस केंद्रबिंदु का दक्षिण भारत में आना दकनी का 'बदला' भी माना जा सकता है। यह इसलिए क्योंकि जब १८ शताब्दी में आधूनिक उर्दू का निर्माण किया जा रहा था, तब दकनी के लेखकों पर "अशुद्ध" उर्दू इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया था। और पढ़िए (अंग्रेज़ी में) <a href="http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/1154773.cms">यहाँ</a>।</span>गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1120450432985043892005-07-03T21:12:00.000-07:002005-07-04T01:02:07.526-07:00उड़िसा कालेजों में उड़िया सीखना बन्द!<span style="font-size:130%;">जैसे-जैसे उड़िसा के कालेजों में उड़िया की माँग कम होती आ रही है, वैसे-वैसे कालेजों ने उड़िया सिखाना ही बन्द कर दिया है। इतना तक की इस साल से राज्य में कुछ १४० कालेजों में उड़िया नहीं पढ़ाई जाएगी। अंग्रेज़ी में और पढ़िए <a href="http://sify.com/news/fullstory.php?id=13808789">इधर</a>। </span>गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14172122.post-1120448190761828952005-07-03T20:36:00.000-07:002005-07-03T20:36:30.766-07:00ताईवान में अंग्रेज़ी समस्या<span style="font-size:130%;">ताईवान में अंग्रेज़ी पर ज़ोर के बावजूद विद्यार्थी अंतर्राष्ट्रीय अंग्रेज़ी परीक्षा में असफ़ल। और पढ़िए <a href="http://www.chinapost.com.tw/editorial/detail.asp?GRP=I&amp;id=64305">इधर</a>।</span>गिरिधर | giridharhttp://www.blogger.com/profile/00964919802142337619noreply@blogger.com